इमारत | Imarat – Home

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इमारत

In his poem titled इमारत | Imarat – Home Bachia Ke Tau takes up on one of the basic necessities of every creature

Building a safe & durable nest is never easy even for the strongest one!

Tau ji has expanded the term Building or Castle not only for Body or Soul but also to society, planets and universe.

कभी चुनी थी मैंने
एक ईमारत ईंट ईंट
जानकर भी, कि
गिरना इसका अवश्यमभावी था क्योंकि
नींव मैंने नहीं रखी थी
सिर्फ एक आभास था कि
नींव मौजूद है कहीं
और अब लगता है कि कदाचित
नीवं और ईमारत मेल नहीं खाते एक दूसरे से
गिरना तो इसे है ही फिर
मैं क्यों हटाउं –
अपने ही द्वारा चुनी ईटें
छोड़ दी पूरी ईमारत मैंने उसके ही भाग्य पर
सोचकर कि
गिरेगी एक बरगी ये बा आवाज-ए बुलन्द
जान जायेगी सारी दुनिया और मैं भी
कि ढह गयी ईमारत
पर मरी ये ईमारत गिर भी रही है तो
ईंट ईंट आहिस्ता आहिस्ता बेआवाज
मुझ से ही नजर बचाकर जानें क्यों
चलो गिरी तो सही
भले ही सिसक सिसक कर
अब रह गयी है शेष वो धरोहर (नीवं)
जो मैंने नहीं रखी थी
इसे जरूर मैं नोंच फेकूंगा
फिर भले ही रह जाये
जमीन पर घाव आड़े तिरछे
जैसे सब भरे हैं ये भी भर जायेंगे
दिखने को अवशेष तो न रह जायेंगे
फिर एक और नई ईमारत
भले ही न बने
पर वह तो न रह जायेगी
जो कभी
मैंने चुनी थी
एक अर्थहीन धरोहर पर – – – –

*************

सूर्य

 I his poem on Sun, Bachia Ke Tau reminds us not to forget the efforts put in by everyone else behind our success

How can Sun be proud of itself?

बड़ा गर्व है तुम्हें अपने सूर्य होने
पर स्मरण रहे
सूर्य बनना तुम्हारा कर्म नहीं
तुम्हारी नियति है
नहीं संभलता था तुमसे तुम्हारा द्रव्य
और घोर अभिमान
न था तुम्हारा परिचय न पता
जब अति से अधिक हो गया तुम्हारा संग्रह
और धू धू कर जलने लगा तुम्हारा द्रव्य
सोने सा पिघल गया तुम्हारा अहम्
तब हुआ था तुम्हारा जन्म
ये प्रकाश और तप तुम्हारी देन नहीं हैं
तुम्हारा प्राशचित्य हैं कहीं
भूल से भी मत ये सोच लेना
तुम्हारे चारों तरफ परिक्रमा करते
ये पिंड तुम्हारे कर्मों पर टिके हैं
या इनका अस्तित्व तुमसे है
वस्तुतः तुम्हारा परिचय इनसे है
ये थोड़ा जीते हैं थोड़ा जियेंगे
भस्म हो जायेंगे पर
तुम्हें तुम्हारा नाम दे जायेंगे
महानता चिरन्तरता में नहीं छड़िक्ता में है
स्थिरता में नहीं चंचलता में है
व्यवस्था में नहीं विकर्णता में है
नमन में नहीं नास्तिकता में है
अस्तित्व में नहीं अमरत्व में है

 

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PoetryBachia Ke Tauइमारतख़ुशीतेरी अदा

 

 

 

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2 thoughts on “इमारत | Imarat – Home

  1. सब चुनते हैं
    एक ईमारत ईंट ईंट
    जानकर भी कि
    वक़्त हालात और किस्मत के सामने
    खड़े रहना इसका
    बहुत मुश्किल है, लेकिन
    बिना ईमारत के रहना असम्भव है क्योंकि
    इसकी नींव तो बहुत पहले
    कहीं कोई रख देता है
    हमको बनानी है, सिर्फ एक
    मजबूत खूबसरत ईमारत
    नींव और ईमारत भले ही मेल न खायें एक दूसरे से
    फिर भी
    कोशिश करनी है एक ईमारत बनाने की
    ईंटे तो खुद ही चुनीं हैं
    मेहनत और लगन से
    गिरने नहीं देना है इसे यूं भाग्य के भरोसे
    ईंट ईंट आहिस्ता आहिस्ता क्योंकि
    नींव तो फिर भी रह जायेगी
    ये जताने को कि
    हमने भी चुनी थी कभी
    एक ईमारत ईंट ईंट – – –

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