यूँ ही | Yun Hi – Why

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 Sher-o-Shayari by Mr Khallas on serious issues unlike his character hence यूँ ही | Yun Hi – Why

Honesty is just skin deep!

Why! between humour and emotion there lies a vast plane of confusion. Why appearance is deceptive. Why we can not trust things at their face value. Mr Khallas wonders if he needs sixth sense to understand the world.  Enjoy reading from confused Khallas.

आओ सुनाए तुमको आज और अन्दाज में
कहीं वो आजमाने न लगें हमको अपने ही अन्दाज में

शराफत तो बस skin deep है
अन्यथा तो बस गुनाह ही गुनाह है

फुसफुसा कर कान में कुछ यूँ कहा उसने
खल्लास समझ बैठे कुछ महत्वपूर्ण कहा उसने

वो एक के पीछे zero लगाते गये
खल्लास उधर खड़े मुस्कराते रहे

वो सुरक्षा चक्र बढ़ाते गए
खल्लास दुआ में हाथ उठाते गए

वो कृत्रिम प्रक्रियाओं की प्राथमिकता समझाते गए
खल्लास प्रकृति के नियम दोहराते रहे

In his Sher-o-Shayari Mr Khallas expresses his scepticism when someone shares a secret

Do not share this secret with anyone else!

खल्लास जिधर मुड़ जाओ रास्ते खुल जाते हैं
चलते चले जाओ रास्ते फिर मिल जाते हैं

शिकवे शिकायत से क्या लेना देना
चलो आज बिन बहाने कुछ समय गुजारें

अब दिन और रात में भेद कहां
समय का तकाज़ा है
खल्लास बचा ही क्या जो गंवाना है

चंद कदम चले ही थे कि पग डगमगाने लगे
दो जाम पिए भी न थे कि होश में आने लगे

चले जब बन ठन के तो ये भूल गये
चलना संभल संभल के जो सुनते आये थे बचपन से

यादें तो होती है भूल जाने के लिये
चंद खूबियां काफी हैं दुनियादारी निभाने के लिये

In his Sher-o-Shayari Mr Khallas wonders why war gets precedence over peace

Do they need war or opportunities?

हमको सिखाते रहे जीने कि कला जो मर मर के
हम साथ भी निभा न सके उनसे दो पल के लिये

रुके ऐसे कि चलना भी भूल गये
मंजिल तो मंजिल रास्ता भी भूल गये

रूह ज़िस्म में न नशा जाम में
हर रोज होता है जब सूरज आसमान में

चलने दो दौर जाम के रुकने न दो
मंजिल तो बहाना है, दूर हमको जाना है

बंजर हो जाये जमीं तो कर लेना याद जरा
क्यूँ कभी गुलिस्ता सजा करते थे यहाँ

जमीं जब सूरज को निगलने लगे
लौट चलो, कहते हैं शाम होने लगी

चंद कदमों की थी ये ज़िन्दगी
फिर बेइन्तहा लफ़्ज़ों में क्यूँ उलझ गयी ये ज़िन्दगी

क़तरा क़तरा ज़िस्म से जान जब निकलने लगे
मुस्करा लो, यही तो निशां है, मंजिल अब आसां है

 

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